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मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम्।ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्गुणलब्क्षये|
तत्वार्थ सूत्र अध्याय १ से १०

आचार्य श्री १०८ उमास्वामीजी महाराज, जीवन परिचय
आचार्य श्री उमास्वामी, जिन्हें उमास्वाति, उमास्वामिन्, वाचक उमास्वाति, नागरवाचक तथा गृद्धपिच्छाचार्य के नाम से भी जाना जाता है, जैन धर्म के इतिहास में एक अद्वितीय और सर्वोच्च स्थान रखते हैं। वे उन विरले आचार्यों में हैं जिन्हें दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों परम्पराएँ समान श्रद्धा और सम्मान से स्वीकार करती हैं। उनकी अमर कृति “तत्त्वार्थसूत्र” जैन धर्म का ऐसा दार्शनिक ग्रन्थ है जिसे सम्पूर्ण जैन समाज ने प्रमाणग्रन्थ के रूप में स्वीकार किया है। इस असाधारण उपलब्धि के कारण आचार्य उमास्वामी को जैन दर्शन का महान व्यवस्थितकर्ता, जैन सिद्धान्तों का सूत्रकार तथा प्राचीन भारत के श्रेष्ठतम दार्शनिकों में गिना जाता है। जैन परम्परा उन्हें ऐसे महामनीषी के रूप में स्मरण करती है जिन्होंने भगवान महावीर के उपदेशों को एक सुव्यवस्थित, संक्षिप्त और सर्वमान्य दार्शनिक स्वरूप प्रदान किया। -तत्वार्थसूत्र, बा.ब्र.प्रदीप पियूष|
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